कजरी तीज : इस व्रत से वैवाहिक जीवन में आती है सुख- समृद्धि, जानें क्या है इसका महत्व और पूजा विधि

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पुणे : समाचार ऑनलाइन (असित मंडल ) – आज कजरी तीज है। आज महिलाओं अपनी पति की लंबी उम्र की कामना के साथ कजरी तीज का व्रत रखती है। वहीं कुंवारी लड़कियां भी मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती है। हर साल भादो माह के कृष्ण पक्ष में कजरी तीज पड़ती है। यह हिंदू त्यौहार अंधेरे पखवाड़े (कृष्ण पक्ष) के तीसरे दिन भद्रपद के चंद्र महीने में मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, इस वर्ष कजरी तीज 06 अगस्त यानी कि आज गुरुवार को है। यह राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के प्रमुख क्षेत्रों में इस त्यौहार का बहुत महत्व है।

क्या हैं महत्त्व –
हिन्दू धर्म में तीज का त्यौहार साल में चार बार आता है, इनमें अखा तीज, हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज शामिल हैं। अन्य तीज व्रत की तरह ही कजरी तीज भी सुहाग की रक्षा और वैवाहिक जीवन में सुख, समृद्धि बनाए रखने के लिए की जाती है। सुहागिनें जहां अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित लड़कियां अच्छा वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं। कजरी तीज का व्रत निर्जला रखा जाता है। हालांकि गर्भवती महिलाओं को फलाहार करने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा सुहागिनें बीमारी या फिर किसी अन्‍य कारण से व्रत न रखने में समर्थ न हों तो वह एक बार व्रत का उद्यापन करने के बाद फलाहार करके व्रत कर सकती हैं। इस त्यौहार को कई राज्य अलग-अलग नामों से मनाते है।

सिंधी समुदाय भी तीज के नाम से इस त्योहार को मनाता है। यह त्योहार भगवान शिव के लिए देवी पार्वती के समर्पण का प्रतीक है। आज भी, महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी आयु के लिए ‘निर्जरा व्रत’ रखकर इस पौराणिक घटना को याद करती हैं। यह त्योहार जोड़ों के बीच के बंधन को मजबूत करने में भी मदद करता है।

भगवान शिव-देवी पार्वती का मिलन –
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, इससे प्रसन्न होकर शिव ने हरियाली तीज के दिन ही माँ पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। अखंड सौभाग्य का प्रतीक यह त्यौहार भारतीय परंपरा में पति-पत्नी के प्रेम को और प्रगाढ़ बनाने तथा आपस में श्रद्धा और विश्वास कायम रखने का त्यौहार है इसके आलावा यह पर्व पति-पत्नी को एक दूसरे के लिए त्याग करने का संदेश भी देता है।

परंपराएं और अनुष्ठान –
हरियाली तीज में हरी चूड़ियाँ, हरे वस्त्र पहनने,सोलह शृंगार करने और मेहंदी रचाने का विशेष महत्व है। इस त्यौहार पर विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर नवविवाहित लड़कियों को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है। लोकमान्य परंपरा के अनुसार नव विवाहिता लड़की के ससुराल से इस त्यौहार पर सिंजारा भेजा जाता है जिसमें वस्त्र,आभूषण, श्रृंगार का सामान, मेहंदी, घेवर-फैनी और मिठाई इत्यादि सामान भेजा जाता है। इस दिन महिलाएं मिट्टी या बालू से मां पार्वती और शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती हैं। पूजन में सुहाग की सभी सामिग्री को एकत्रित कर थाली में सजाकर माता पार्वती को चढ़ाना चाहिए।

नैवेध में भगवान को खीर पूरी या हलुआ और मालपुए से भोग लगाकर प्रसन्न करें। तत्पश्चात भगवान शिव को वस्त्र चढ़ाकर तीज माता की कथा सुननी या पढ़नी चाहिए। पूजा के बाद इन मूर्तियों को नदी या किसी पवित्र जलाशय में प्रवाहित कर दिया जाता है।शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव और देवी पार्वती ने इस तिथि को सुहागन स्त्रियों के लिए सौभाग्य का दिन होने का वरदान दिया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो सुहागन स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं,उनको सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

राजस्थान के लोगों के लिए यह त्यौहार जीवन का सार है। खासकर राजधानी जयपुर में इसकी अलग ही छठा देखने को मिलती है। तीज के अवसर पर जयपुर में लगने वाला यह मेला पूरी दुनिया में अपना एक विशिष्ठ स्थान रखता है। इस दिन तीज माता की पूजा-अर्चना के बाद तीज माता की सवारी निकाली जाती है।पार्वती जी की प्रतिमा जिसे तीज माता कहते हैं,को जुलूस उत्सव में ले जाया जाता है।उत्सव से पहले प्रतिमा का पुनः रंग-रोगन किया जाता है और नए परिधान तथा आभूषण पहनाए जाते हैं शुभ मुहूर्त में जुलूस निकाला जाता है।

लाखों लोग इस दौरान माता के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ते हैं। सुसज्जित हाथी और घोड़े इस जुलूस की शोभा को बढ़ा देते हैं यह सवारी त्रिपोलिया बाज़ार,छोटी चौपड, गणगौरी बाज़ार और चौगान होते हुए पालिका बाग़ पहुंचकर विसर्जित होती है। सवारी को देखने के लिये रंग बिरंगी पोशाकों से सजे ग्रामीणों के साथ ही भारी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। चारों तरफ रंग-बिरंगे परिधानों में सजे लोग,घेवर-फीणी की महक,प्रकृति का सौंदर्य इस त्यौहार को और भी अनूठा बना देते हैं।

खुले स्थान पर बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर बंधे हुए झूले,स्त्रियों व बच्चों के लिए बहुत ही मनभावन होते हैं। मल्हार गाते हुए मेहंदी रचे हुए हाथों से रस्सी पकडे झूलना एक अनूठा अनुभव ही तो है। नारियां,सखी-सहेलियों के संग सज-संवर कर लोकगीत,कजरी आदि गाते हुए झूला झूलती हैं। पूरा वातावरण ही गीतों के मधुर स्वरों से संगीतमय,गीतमय,रसमय हो उठता है।

कैसे करें पूजन –
– इस दिन महिलाएं स्नान के बाद भगवान शिव और माता गौरी की मिट्टी की मूर्ति बनाती हैं। कई महिलाएं बाजार से लाई मूर्ति का पूजा में उपयोग करती हैं।
– व्रती महिलाएं माता गौरी और भगवान शिव की मूर्ति को एक चौकी पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर स्थापित करती हैं।
– इसके बाद वे शिव-गौरी का विधि विधान से पूजन करती हैं।
– पूजा के दौरान माता गौरी को सुहाग के 16 समाग्री अर्पित करती हैं।
– भगवान शिव को बेल पत्र, गाय का दूध, गंगा जल, धतूरा, भांग आदि चढ़ाती हैं।
– फिर धूप और दीप आदि जलाकर आरती करती हैं और शिव-गौरी की कथा सुनती हैं।

 

ऐसे खोलें व्रत –
यह व्रत काफी हद तक करवाचौथ की तरह होता है। इसमें पूरे दिन व्रत रखते हैं और शाम को चंद्रोदय के बाद व्रत खोला जाता है। कजरी तीज के दिन जौ, गेहूं, चने और चावल के सत्तू में घी और मेवा मिलाकर तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। चंद्रोदय के बाद भोजन करके व्रत तोड़ा जाता है।

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