नागपुर. ऑनलाइन टीम : महाराष्ट्र की अग्रणी साहित्य संस्था विदर्भ साहित्य संघ ने मराठी साहित्य के कवि यशवंत मनोहर को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने के लिए आमंत्रित किया था, मगर कार्यक्रम में यशवंत मनोहर ने जो कुछ भी किया, वह साहित्यकारों की पूरी बिरादरी को स्तब्ध कर गया। मां सरस्वती को विद्या और ज्ञान की देवी कहा जाता है, लेकिन मनोहर इससे अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि देवी सरस्वती की मूर्ति उस शोषक मानसिकता की प्रतीक है, जिसने महिलाओं और शूद्रों को शिक्षा एवं ज्ञान प्राप्त करने से दूर किया। अपने तर्कों के बल पर उन्होंने मंच से मां सरस्वती की प्रतिमा को हटाने के लिए कहा, इस पर आयोजक नाराज हो गए।

उनका कहना था कि बिना मां सरस्वती के साहित्य और सृजन कैसे? हम आपके लिए मां सरस्वती को नाराज नहीं कर सकते। संस्था के अधिकारियों के मुताबिक, उनके सम्मान समारोहों में मंच पर सरस्वती पूजन की परंपरा 90 वर्ष से अधिक समय से निभाई जा रही है और इसे कभी बदला नहीं गया। आयोजकों ने उनकी  बात को स्वीकार नहीं किया और साफ शब्दों में कहा कि सम्मान समारोह का स्वरूप नहीं बदला जा सकता। इसके बाद यशवंत समारोह में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने कार्यक्रम का आयोजन करने वाली संस्था को एक खुली चिट्ठी लिखी।

मराठी में लिखी इस चिट्ठी में यशवंत ने लिखा, ‘मैं उम्मीद कर रहा था कि विदर्भ साहित्य संघ मेरे विचार और सिद्धांतों के बारे में सोचेगा और अपने कार्यक्रमों में बदलाव करेगा। लेकिन अधिकारियों ने मुझे बताया कि मंच पर देवी सरस्वती की मूर्ति होगी। मैंने ऐसे कई सम्मान और पुरस्कार इसी एक कारण से छोड़ दिए हैं। मैं साहित्य में धर्म का दखल स्वीकार नहीं कर सकता, ऐसे में मैं इस सम्मान को स्वीकार करने से इनकार करता हूं।’

बता दें कि विदर्भ साहित्य संघ की स्थापना वर्ष 1923 में मराठी साहित्य के विस्तार के लिए हुई थी। हर वर्ष यह संस्था ऐसे ही सम्मान समारोह में मराठी साहित्य से जुड़े लोगों को सम्मानित करती है। संस्था की ओर से हर दो वर्ष पर एक लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी दिया जाता है, जिसके लिए इस साल यशवंत मनोहर को चुना गया था। कार्यक्रम का आयोजन संस्था के रंग शारदा हॉल में 14 जनवरी को आयोजित किया गया था।

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